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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
यदा रौद्रा धर्महीना मांसादाः पानपास्तथा |  ६७   क
भविष्यन्ति नरा नित्यं तदा सङ्क्षेप्स्यते युगम् ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति