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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
पुष्पे पुष्पं यदा राजन्फले फलमुपाश्रितम् |  ६८   क
प्रजास्यति महाराज तदा सङ्क्षेप्स्यते युगम् ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति