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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
अकालवर्षी पर्जन्यो भविष्यति गते युगे |  ६९   क
अक्रमेण मनुष्याणां भविष्यति तदा क्रिय़ा |  ६९   ख
विरोधमथ यास्यन्ति वृषला व्राह्मणैः सह ||  ६९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति