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वन पर्व
अध्याय १८८
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वैशम्पाय़न उवाच
कां च काष्ठां समासाद्य पुनः सम्पत्स्यते कृतम् |  ७   क
विस्तरेण मुने व्रूहि विचित्राणीह भाषसे ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति