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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
मही म्लेच्छसमाकीर्णा भविष्यति ततोऽचिरात् |  ७०   क
करभारभय़ाद्विप्रा भजिष्यन्ति दिशो दश ||  ७०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति