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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
दिशः प्रज्वलिताः सर्वा नक्षत्राणि चलानि च |  ७४   क
ज्योतींषि प्रतिकूलानि वाताः पर्याकुलास्तथा |  ७४   ख
उल्कापाताश्च वहवो महाभय़निदर्शकाः ||  ७४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति