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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
षड्भिरन्यैश्च सहितो भास्करः प्रतपिष्यति |  ७५   क
तुमुलाश्चापि निर्ह्रादा दिग्दाहाश्चापि सर्वशः |  ७५   ख
कवन्धान्तर्हितो भानुरुदय़ास्तमय़े तदा ||  ७५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति