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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
लवणं चोरय़ित्वा तु चीरीवाकः प्रजाय़ते |  ९५   क
दधि हृत्वा वकश्चापि प्लवो मत्स्यानसंस्कृतान् ||  ९५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति