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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
अथ देशान्दिशश्चापि पत्तनानि पुराणि च |  ८३   क
क्रमशः संश्रय़िष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ||  ८३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति