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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
कालवर्षी च पर्जन्यो नक्षत्राणि शुभानि च |  ८८   क
प्रदक्षिणा ग्रहाश्चापि भविष्यन्त्यनुलोमगाः |  ८८   ख
क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं भविष्यति निरामय़म् ||  ८८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति