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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
स धर्मविजय़ी राजा चक्रवर्ती भविष्यति |  ९१   क
स चेमं सङ्कुलं लोकं प्रसादमुपनेष्यति ||  ९१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति