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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
उत्थितो व्राह्मणो दीप्तः क्षय़ान्तकृदुदारधीः |  ९२   क
स सङ्क्षेपो हि सर्वस्य युगस्य परिवर्तकः ||  ९२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति