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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
स सर्वत्र गतान्क्षुद्रान्व्राह्मणैः परिवारितः |  ९३   क
उत्सादय़िष्यति तदा सर्वान्म्लेच्छगणान्द्विजः ||  ९३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति