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आदि पर्व
अध्याय ८०
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वैशम्पाय़न उवाच
पूरो प्रीतोऽस्मि भद्रं ते गृहाणेदं स्वय़ौवनम् |  १०   क
राज्यं चैव गृहाणेदं त्वं हि मे प्रिय़कृत्सुतः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति