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उद्योग पर्व
अध्याय ३२
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सञ्जय़ उवाच
परप्रय़ुक्तः पुरुषो विचेष्टते; सूत्रप्रोता दारुमय़ीव योषा |  १२   क
इमं दृष्ट्वा निय़मं पाण्डवस्य; मन्ये परं कर्म दैवं मनुष्यात् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति