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वन पर्व
अध्याय ९३
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वैशम्पाय़न उवाच
अगस्त्यो भगवान्यत्र गतो वैवस्वतं प्रति |  ११   क
उवास च स्वय़ं यत्र धर्मो राजन्सनातनः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति