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शान्ति पर्व
अध्याय २९५
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वसिष्ठ उवाच
यदा तु गुणजालं तदव्यक्तात्मनि सङ्क्षिपेत् |  १५   क
तदा सह गुणैस्तैस्तु पञ्चविंशो विलीय़ते ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति