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शान्ति पर्व
अध्याय २८७
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पराशर उवाच
परार्थे वर्तमानस्तु स्वकार्यं योऽभिमन्यते |  २१   क
इन्द्रिय़ार्थेषु सक्तः सन्स्वकार्यात्परिहीय़ते ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति