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आदि पर्व
अध्याय १८९
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वैशम्पाय़न उवाच
स तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यरूपं; जग्राह पादौ सत्यवत्याः सुतस्य |  ४०   क
नैतच्चित्रं परमर्षे त्वय़ीति; प्रसन्नचेताः स उवाच चैनम् ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति