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वन पर्व
अध्याय २४१
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वैशम्पाय़न उवाच
किमस्माकं भवेच्छ्रेय़ः किं कार्यमवशिष्यते |  १४   क
कथं नु सुकृतं च स्यान्मन्त्रय़ामास भारत ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति