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शान्ति पर्व
अध्याय २०६
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गुरुरु उवाच
रमत्ययं यथा स्वप्ने मनसा देहवानिव |  १४   क
कर्मगर्भैर्गुणैर्देही गर्भे तदुपपद्यते ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति