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शान्ति पर्व
अध्याय १८९
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भीष्म उवाच
आत्मवुद्धिं समास्थाय़ शान्तीभूतो निरामय़ः |  २१   क
अमृतं विरजःशुद्धमात्मानं प्रतिपद्यते ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति