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वन पर्व
अध्याय १८९
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मार्कण्डेय़ उवाच
धर्मे त्वय़ात्मा संय़ोज्यो नित्यं धर्मभृतां वर |  १७   क
धर्मात्मा हि सुखं राजा प्रेत्य चेह च नन्दति ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति