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शल्य पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
विवृताक्षश्च कौन्तेय़ो वेपमानश्च मन्युना |  ४८   क
चिच्छेद योधान्निशितैः शरैः शतसहस्रशः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति