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वन पर्व
अध्याय १८९
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्रमादाद्यत्कृतं तेऽभूत्संय़ग्दानेन तज्जय़ |  २२   क
अलं ते मानमाश्रित्य सततं परवान्भव ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति