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विराट पर्व
अध्याय ६२
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वैशम्पाय़न उवाच
भय़ात्सन्त्रस्तमनसः समाजग्मुस्ततस्ततः |  ३   क
मुक्तकेशा व्यदृश्यन्त स्थिताः प्राञ्जलय़स्तदा ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति