वन पर्व  अध्याय १८९

मार्कण्डेय़ उवाच

संस्तूय़मानो विप्रेन्द्रैर्मानय़ानो द्विजोत्तमान् |  ५   क
कल्किश्चरिष्यति महीं सदा दस्युवधे रतः ||  ५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति