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कर्ण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
भिन्ननौका यथा राजन्द्वीपमासाद्य निर्वृताः |  ७२   क
भवन्ति पुरुषव्याघ्र नाविकाः कालपर्यये ||  ७२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति