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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
स्यालो द्रोणस्य यश्चैको दय़ितो व्राह्मणो महान् |  ११   क
स च तस्मिन्महेष्वासः कृपः समभवत्तदा ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति