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कर्ण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
विहाय़ तान्वाणगणानथागतौ; सुहृद्वृतावप्रतिमानविक्रमौ |  ६२   क
सुखं प्रविष्टौ शिविरं स्वमीश्वरौ; सदस्यहूताविव वासवाच्युतौ ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति