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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो निशि महाराज धृतराष्ट्रः कुरूद्वहान् |  ३१   क
जनार्दनं च मेधावी व्यसर्जय़त वै गृहान् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति