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वन पर्व
अध्याय ५८
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वृहदश्व उवाच
एष विन्ध्यो महाशैलः पय़ोष्णी च समुद्रगा |  २१   क
आश्रमाश्च महर्षीणाममी पुष्पफलान्विताः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति