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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
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व्राह्मण उवाच
यः स्यादेकाय़ने लीनस्तूष्णीं किञ्चिदचिन्तय़न् |  १   क
पूर्वं पूर्वं परित्यज्य स निरारम्भको भवेत् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति