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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
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व्राह्मण उवाच
यथा हि पुरुषः स्वप्ने दृष्ट्वा पश्यत्यसाविति |  २०   क
तथारूपमिवात्मानं साधु युक्तः प्रपश्यति ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति