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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
तच्छ्रुत्वा विविधं तस्य राजर्षेः परिदेवितम् |  १   क
पुनर्नवीकृतः शोको गान्धार्या जनमेजय़ ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति