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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
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व्राह्मण उवाच
संनिय़म्येन्द्रिय़ग्रामं निर्घोषे निर्जने वने |  ३४   क
काय़मभ्यन्तरं कृत्स्नमेकाग्रः परिचिन्तय़ेत् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति