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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
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व्राह्मण उवाच
यथा स्वकोष्ठे प्रक्षिप्य कोष्ठं भाण्डमना भवेत् |  ४२   क
तथा स्वकाय़े प्रक्षिप्य मनो द्वारैरनिश्चलैः |  ४२   ख
आत्मानं तत्र मार्गेत प्रमादं परिवर्जय़ेत् ||  ४२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति