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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
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व्राह्मण उवाच
इदं सर्वरहस्यं ते मय़ोक्तं द्विजसत्तम |  ४७   क
आपृच्छे साधय़िष्यामि गच्छ शिष्य यथासुखम् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति