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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
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व्राह्मण उवाच
न कस्यचित्स्पृहय़ते नावजानाति किञ्चन |  ५   क
निर्द्वन्द्वो वीतरागात्मा सर्वतो मुक्त एव सः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति