आश्वमेधिक पर्व  अध्याय १९

वासुदेव उवाच

नैतत्पार्थ सुविज्ञेय़ं व्यामिश्रेणेति मे मतिः |  ५१   क
नरेणाकृतसञ्ज्ञेन विदग्धेनाकृतात्मना ||  ५१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति