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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
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वासुदेव उवाच
क्रिय़ावद्भिर्हि कौन्तेय़ देवलोकः समावृतः |  ५४   क
न चैतदिष्टं देवानां मर्त्यै रूपनिवर्तनम् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति