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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
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वासुदेव उवाच
परा हि सा गतिः पार्थ यत्तद्व्रह्म सनातनम् |  ५५   क
यत्रामृतत्वं प्राप्नोति त्यक्त्वा दुःखं सदा सुखी ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति