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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
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वासुदेव उवाच
किं पुनर्व्राह्मणाः पार्थ क्षत्रिय़ा वा वहुश्रुताः |  ५७   क
स्वधर्मरतय़ो नित्यं व्रह्मलोकपराय़णाः ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति