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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १९
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वैशम्पाय़न उवाच
आनय़ित्वा कुरुश्रेष्ठो व्राह्मणेभ्यः प्रय़च्छतु |  १२   क
दीनान्धकृपणेभ्यश्च तत्र तत्र नृपाज्ञय़ा ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति