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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १९
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वैशम्पाय़न उवाच
इति मामव्रवीद्राजा पार्थश्चैव धनञ्जय़ः |  १४   क
यदत्रानन्तरं कार्यं तद्भवान्वक्तुमर्हति ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति