आश्रमवासिक पर्व  अध्याय १९

वैशम्पाय़न उवाच

वृकोदरकृते चाहमर्जुनश्च पुनः पुनः |  ९   क
प्रसादय़ाव नृपते भवान्प्रभुरिहास्ति यत् ||  ९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति