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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
अहं च जानामि भविष्यरूपं; पश्यामि वुद्ध्या स्वय़मप्रमत्तः |  ९५   क
दृष्टिश्च मे न व्यथते पुराणी; युध्यमाना धार्तराष्ट्रा न सन्ति ||  ९५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति