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द्रोण पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
ततो हता नररथवाजिकुञ्जरै; रनेकशो द्विपरथवाजिपत्तय़ः |  ७३   क
गजैर्गजा रथिभिरुदाय़ुधा रथा; हय़ैर्हय़ाः पत्तिगणैश्च पत्तय़ः ||  ७३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति