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सभा पर्व
अध्याय १९
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वैशम्पाय़न उवाच
तेऽथ द्वारमनासाद्य पुरस्य गिरिमुच्छ्रितम् |  १४   क
वार्हद्रथैः पूज्यमानं तथा नगरवासिभिः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति