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सभा पर्व
अध्याय १९
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वैशम्पाय़न उवाच
स्थिरं सुविपुलं शृङ्गं सुमहान्तं पुरातनम् |  १८   क
अर्चितं माल्यदामैश्च सततं सुप्रतिष्ठितम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति